Thursday, June 14, 2018

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष श्रृंखला ( प्रथम विचार) ‘‘योगः चित्तवृत्ति निरोध:‘‘

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष श्रृृंखला ( प्रथम विचार)

‘‘योगः चित्तवृत्ति निरोध:‘‘



अनूपपुर  14 जून 2018/ सभी देशवासियों को आगामी अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की हार्दिक शुभ-कामनायें। 21 जून को अंतराष्ट्रीय योग दिवस की मान्यता  हमारे देश की वैश्विक स्तर पर एक बड़ी उपलब्धि के रूप में स्थापित हुई है। योग भारत की एक प्राचीन परंपरा रही है, जो लगभग 5000 वर्षों से प्रचलित है। योग साधना ने बडे़-बडें चमत्कार किये है, मुख्यतः योग के चार प्रकार है। प्रथम राज योग इसका सबसे महत्वपर्ण अंग ध्यान है। इसके आठ अंग है, जिस कारण महर्षि पतंजलि ने इसे अष्टांग योग भी कहा है। द्वितीय कर्म योग इसमें कर्म प्रधान है जो हमें निःस्वार्थ जीवन जीने और दूसरे की सेवा करनें की प्रेरणा देता है। तृतीय भक्ति योग इसमें निराकार ब्रम्ह की आराधना और भक्ति की महता है, यह हमें सभी की स्वीकार्यता और सहिष्णुता पैदा करने का अवसर प्रदान करता है। चतुर्थ ज्ञान योग अगर हम भक्ति को मन का योग मानते है, तो ज्ञान योग बुद्धि का योग है। यह सबसे कठिन योग माना जाता है।
 वास्तव में योग सही तरीके से जीवन जीने का विज्ञान है, जो भौतिक, मानसिक, भावनात्मक, आत्मिक और आध्यात्मिक सभी पहलुओं पर कार्य करता है। योग का अर्थ जोड़नें या बांधने से है। आध्यात्मिक स्तर पर इस जुडने का अर्थ सार्वभौमिक चेतना के साथ व्यक्तिगत चेतना का एक होना है। 
सर्वप्रथम योग से बाहरी (शारीरिक) लाभ प्राप्त होते है, तत्पश्चात यह मानसिक और भावनात्मक स्तर पर कार्य करता है। रोजमर्रा की जिंदगी में लोग तनाव और अनेक मानसिक परेशनियों का सामना करते है, इससे मुक्ति के लिये योग साधना एक सिद्ध विधि है। 
योग आनंद का एक ऐसा स्त्रोत है जो मानव कल्याण के लिये अत्यंत आवश्यक है। योग से आनंद और सुख की अनुभूति  होती है, साथ ही योग करने वाले व्यक्ति के आचार-विचार परिष्कृत होते है। वैसे तो इस मायावी संसार में व्यक्ति को केवल भौतिक सुख की लालसा रहती है, पर जब हम भौतिक सुख-सुविधओं से अनुकूलन कर आलस्य के पराधीन हो जाते है। तब हमारा विवेक हमें योग की ओर जाने के लिये प्रेरित करता है। 
‘‘योगः चित्तवृत्ति निरोध:‘‘ यानि चित्तवृत्तियों का निरोध ही योग है। यह आंतरिक तत्व है जिसे साधक आत्मचिंतन और आत्म विश्लेषण से ही जान सकता है, जब हम अपनी शक्ति और सामर्थ्य का दुरूपयोग छोड़कर, अपने अंदर विद्यमान विकारों को त्यागते है और समविष्ट भाव को ह्नदर्यगम करते है तथा संयमित होते हुये आत्मोन्मुखी होते हैं तो अद्भुत आनंद की अनुभूति होती है। 

( विचार अभिव्यक्ता श्री सतीश आनंद तिवारी आदिम जाति कल्याण विभाग के मण्डल संयोजक एवं आनंद विभाग के नोडल अधिकारी है)

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