Thursday, June 21, 2018

वृद्ध मां और छोटे भाई का सहारा बनी चंपा (सफलता की कहानी)

वृद्ध मां और छोटे भाई का सहारा बनी चंपा (सफलता की कहानी) 
गरीबी से समृद्धि तक हौसलों से भरा सफर, कृषि सामुदायिक स्त्रोत व्यक्ति (सीआरपी) के रूप में हरियाणा और उ.प्र. में दी अपनी सेवाएं 
अनुपपुर | 21-जून-2018
 
 
   चंपा का जन्म एक बेहद ही गरीब परिवार में पुष्पराजगढ़ विकासखंड के सुनियामार ग्राम में हुआ था। मात्र 12 वर्ष की उम्र में ही सर से पिता का साया उठ गया, पिता के देहांत के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी मां पर आ गई और चंपा को भी मां के कार्यों में हाथ बटाना मजबूरी हो गयी। घर की कमजोर आर्थिक स्थित के कारण चंपा को पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी और कक्षा आठवीं तक शिक्षा प्राप्त कर पायी।
   कुछ दिनों बाद बड़े भाई की शादी हो गयी, लेकिन इसके बाद चंपा और उसकी मां और चंपा के छोटे भाई को बड़े भाई ने घर से अलग कर दिया ऐसे में परिवार की जिम्मेदारियां और बढ़ र्गइं। कुछ समय बाद 17 साल की उम्र मे चंपा का विवाह भी पास के ही गांव में हो गया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था, शादी के कुछ समय बाद उसके पति का भी देहांत हो गया और चंपा के उपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। ऐसी विपरीत स्थिति में उसे मां का घर ही सबसे बड़ा सहारा लगा और वह अपने मां के घर आकर रहने लगी। बचपन से संघर्ष कर रही चंपा के लिए अब जिंदगी को एक नये सिरे से प्रारंभ करना और साथ में मां और छोटे भाई की देखभाल करना उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। कहते हैं कि हिम्मत हो तो सब संभव है, चंपा ने भी हार नहीं मानी और कुछ करने के जज्बे के साथ स्व सहायता समूह से जुड़ने का निर्णय लिया। आजीविका मिशन से जानकारी प्राप्त कर उसने अपने मोहल्ले की दस महिलाओं को जोड़कर कृष्णा स्व सहायता समूह का गठन किया और समूह के नियमों का पालन करते हुए सभी महिलाएं मिल जुल कर समूह का संचालन करने लगीं।
    चंपा ने कुछ दिनों बाद समूह के बुक कीपर का प्रशिक्षण आजीविका मिशन के माध्यम से प्राप्त किया और
वह समूह के बुक कीपर का कार्य भी करने लगी। समूह से जुड़ने के बाद चंपा को एक रास्ता नजर आया और उसकी छोटी मोटी जरूरते समूह से तो पूरी होने लगीं, लेकिन शायद इतना काफी नहीं था परिवार चलाने के लिए। इसी बीच चंपा को जानकारी हुयी कि म.प्र.दीन दयाल अंत्योदय योजना राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से कृषि सखी का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, उसने अपनी रूचि दिखाई और कृषि सखी के रूप में प्रशिक्षण प्राप्त कर कार्य प्रारंभ कर दिया।
    कृषि सखी के रूप में जिलें मे जैविक कृषि के प्रोत्साहन हेतु ग्रामीण महिलाओं को कम लागत कृषि तकनीकी के बारे में परिचित कराते हुए आजीविका पोषण वाटिका, वर्मी, नाडेप आदि गतिविधियों के बारे में ग्रामीण किसानों को प्रोत्साहित किया। कृषि सखी के रूप में कार्य करते हुए चंपा को हरियाणा राज्य के झज्जर जिले में भी 15 दिनों के सीआरपी राउंड के माध्यम से कार्य करने का मौका मिला और इसके बदले मे उसे पहली बार एक साथ 11600/- रू मानदेय के रूप में प्राप्त हुए, यह उसके जीवन की शायद सबसे बड़ी कमाई थी। इसके बाद उत्तर प्रदेश के हमीरपुर और जालौन जिलों में भी चंपा को कृषि सखी के रूप में कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ और साथ ही साथ अपने गृह जिले अनूपपुर में नियमित रूप से कृषि सखी कार्य कर ही रही हैं।
    कृषि सखी के रूप में प्राप्त मानदेय के साथ साथ अपनी जरूरतो कि पूर्ति के लिए चंपा ने अभी तक अपने समूह से पचास हजार रू ऋण के रूप में लिए और समय अनुसार समूह को ऋण वापसी भी कर रही है। समूह से प्राप्त ऋण से चंपा ने भाई की शिक्षा, स्वास्थ्य और मकान निर्माण पर खर्च किया है तथा आज अपनी जमीन पर खेती एवं सब्जी उत्पादन से प्रतिमाह 11 से 12 हजार रू आय अर्जित कर रही है।
    आजीविका एवं कौशल विकास दिवस को राजधानी भोपाल में कृषि के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य हेतु मुख्य
कार्यपालन अधिकारी, म.प्र.डे राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन श्री एल एम बेलवाल द्वारा चंपा को सम्मानित भी किया गया है।
    चंपा कहती है कि जबसे मैं आजीविका मिशन से जुड़ी हूं, मेरी जीवन को एक नई दिशा मिली है, मेरे अपने सपनों को पूरा करने का एक मंच मिला है। मुझे गर्व है कि मेरी मां आज मुझे बेटी नहीं बेटा कहकर बुलाती हैं। मेरी हिम्मत आजीविका मिशन ही है।

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