Tuesday, April 10, 2018

"सफलता की कहानी" आगे बढ़ने की ललक ही जीवन है

"सफलता की कहानी" आगे बढ़ने की ललक ही जीवन है  
अनूपपुर की सुरतन बाई हैं इसका उदाहरण 
अनुपपुर | 10-अप्रैल-2018
 
  
  कुछ सीखने की उम्र नहीं होती है। आगे बढ़ने की ललक ही जीवन है। अच्छा करने की चाह ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग करती है। अनूपपुर जिले के विकासखंड जैतहरी के ग्राम छातापटपर की रहने वाली सुरतन बाई की उम्र से उनके जज्बे का आकलन नहीं किया जा सकता है। सामान्य कद काठी की ये महिला उम्र के इस पड़ाव में भी विकासपरक सोच रखती है। इनमे आगे बढ़ने की आत्मनिर्भर होने की चाह थी। इस चाह को सहारा मिला जिला प्रशासन के सहयोग एवं कलेक्टर श्री अजय शर्मा के मार्गदर्शन में चल रहे मुर्गीपालन व्यवसाय के संवर्धन के प्रयास से। अनूपपुर मे जिला प्रशासन द्वारा यहां के निवासियों की आजीविका के संवर्धन के कई प्रयास किए जा रहे हैं उन्ही में से एक है मुर्गीपालन द्वारा आय का संवर्धन। इस अभियान के अंतर्गत मैकल वुमन पौल्ट्री प्रोड्यूसर कंपनी जो कि ग्रामीण, अर्ध-साक्षर महिलाओ को प्रौद्योगिकी केंद्रित पोल्ट्री उद्योग का एक हिस्सा बनाने के लिए कार्य कर रही है, द्वारा तकनीकि एवं मार्केटिंग में सहयोग दिया जा रहा है। सुरतन बाई ने प्रशासन द्वारा चलाये जा रहे इस अभिनव प्रयास में विकास की संभावनाओं को जल्द ही भाँप लिया। एवं स्व्सहायता समूह से जुड़कर आपने भी इस व्यवसाय से आत्मनिर्भर होने की दिशा में कदम बढ़ाना प्रारम्भ किया। लेयर मुर्गीपालन से जुड़ी हुई सभी बारीकियों को सीखा और पूरी लगन से इस व्यवसाय मे जुड़ गयी। ब्रायलर मुर्गी पालन शेड का निर्माण महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम के तहत किया गया है। शुरूआती दौर में चूजे दाना, दवाई के कार्यशील पूंजी की व्यवस्था वाटर शेड परियोजना के माध्यम से की हूं। छोटे पोल्ट्री प्रोड्यूसरों ने अब मुर्गी पालन व्यवसाय को समृद्ध करने के लिये मैकल वुमेन पोल्ट्री प्रोड्यूसर कम्पनी प्राइवेट लिमिटेड का गठन कर इस कम्पनी से समृद्ध एवं संगठित होकर व्यवसाय को बढ़ाने के लिये सतत् क्रियाशील है। मैकल वुमेन पोल्ट्री प्रोड्यूसर कम्पनी प्रायवेट लिमिटेट के द्वारा डे ओल्ड चिक्स सोधे मुर्गी पालक के शेड तक पहुंचने का कार्य किया जा रहा हैं। मुर्गी पालन के कार्य के लिये चिकित्सीय सुविधा कराने उपलब्ध कराने हेतु गांवों में मुर्गी पालन कर रहे महिलाओं के परिवार के ही युवकों को सुपरवाइजर के रूप  में प्रशिक्षित कर कार्य में लगाया गया है। इनके द्वारा दाना दवाई बटवारा किया जाता हैं। मरे हुए चूजों का पोस्ट मार्टम कर बीमारी का पता लगा के दवाई दी जाती हैं। साथ ही उत्पादन का हिसाब किताब भी संधारित किया जाता है। सुपराईजरों की साप्ताहिक बैठक कर साप्ताहिक प्रगति की समीक्षा के साथ ही मुर्गी पालन के बीमारियों के बारे में बताने के लिये बिटनरी डॉक्टर द्वारा जानकारी दी जाती है। ब्रायलर मुर्गे 21 दिनों में 1 किलोंग्राम बजन के तथा 35 दिनों के मुर्गे 2 किलोग्राम वनज के तैयार हो जाते है। आज सुरतन बाई को इस व्यवसाय से प्रति महीने 4 से 5 हजार की आय हो जाती है।

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