सफलता की कहानी
चूल्हे की टक़रार को उज्जवला ने बदला प्यार में
अनूपपुर 27 जुलाई 2018/ जंगल से लकड़ी काटकर लाना उन्हें जलाकर अपने पति का एवं अपने बच्चों का भरण पोषण करना यह शांति की दिनचर्या थी।गर्मियों में तपती धूप में लकड़ियाँ लाना फिर धुएँ को सहन कर खाना बनाना यह सब अनूपपुर के ग्राम बरबसपुर की शांति रज़क घर की शांति बनाए रखने के लिए किया करती थीं। परंतु बारिश के मौसम में लकड़ियाँ समय से लाना दुष्कर तो था ही साथ ही गीली लकड़ियों से चूल्हा जलाना तो एक विकट समस्या थी। खाने में देरी से अक्सर ही शांति और सुरेश में झगड़े होते थे। शांति कहती हैं उज्जवला योजना से चूल्हे की टक़रार अब प्यार में बदल चुकी है। न ही अब धुएँ का सामना करना पड़ता है और न ही खाना बनाने में देरी होती है। शांति और सुरेश के दोनो बच्चे संतोषी एवं मुकेश समय से स्कूल भी जा पाते हैं।
बच्चों के भविष्य को उज्जवल किया उज्जवला ने
सुरेश कहते हैं वो अपनी भूख तो सहन कर लेते थे पर बच्चों की भूख एवं स्कूल जाने में देरी उनसे सहन नहीं होती थी। यही टक़रार का कारण था।सुरेश हर वक़्त सोचते थे इस समस्या को कैसे हल किया जाय, परिवार की अन्य ज़रूरतों को पूरा करने में ही सारी कमाई चली जाती थी। ऐसे में गैस कनेक्शन के लिए पैसा जुटा पाना आसान नहीं था। उज्ज्वला योजना से प्राप्त सहायता के कारण ही आज बच्चे समय से स्कूल जा पा रहे हैं। बच्चों के उज्जवल भविष्य में उज्जवला का योगदान समझ पाना औरों के लिए मुश्किल है पर शांति और सुरेश के लिए नहीं।दोनो शासन को इस योजना के लिए तहे दिल से शुक्रिया अदा करते है।
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