| मानवीय सवेदनाओं को जीवित रखने मे साहित्य का विशेष स्थान - कमिश्नर श्री रजनीश श्रीवास्तव |
| समकालीन साहित्य मे बाजार वाद विषय मे दो दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का जैतहरी में हुआ शुभारंभ |
| अनुपपुर | 10-मार्च-2018 |
मुख्य अतिथि कमिश्नर श्री रजनीश श्रीवास्तव ने सामाजिक परिदृश्य मे साहित्य के विशेष स्थान का उल्लेख करते हुए कहा कि मानवीय संवेदनाओं को जीवंत रखने मे साहित्य का विशिष्ट स्थान है। आज बढ़ते हुए बजारवाद के कारण मानवीय मूल्य संशय मे हैं। यही कारण है कि आज जन मानस को व्यवस्थित जीवन व्यतीत करने के लिए बाह्य बल की आवश्यकता महसूस हो रही हैं। आपने कार्यक्रम मे उपस्थित छात्राओं को संबोधित करते हुए यह सलाह दी कि छात्र अपने अंदर की मानवीय संवेदनाओ को सुरक्षित करके रखें। सदैव समाज के उत्थान एवं परहित के कार्यों के लिए तत्पर होकर सशक्त भारत के निर्माण मे सहयोग दे।
मानवीय मूल्यों एवं वैचारिक पीड़ा को निरूपित करने वाला साहित्य ही शास्वत - कलेक्टर श्री शर्मा
कलेक्टर श्री शर्मा ने संगोष्ठी मे उपस्थित प्रबुद्ध जनो से मुखातिब होते हुए कहा कि बाजार को ध्यान मे रख कर लिखे गए साहित्य क्षणिक आनंद दिला पाते हैं। इनकी आयु कम होती है, परंतु मानवीय सवेदनाओं एवं वैचारिक पीड़ाओं को व्यक्त कर रहे उद्गार शास्वत है अमर हैं। आपने कहा ऐसा साहित्य जिसमे मानवीय सवेदनाएं शून्य हो वह साहित्य नही है, मानवीय संवेदनाओ का सजीव चित्रण एवं उसका प्रभावी उपयोग ही समसामयिक साहित्य का लक्ष्य होना चाहिए।
आदिवासी कला को संरक्षित करने में विशेष भूमिका निभा रहा है साहित्य- विधायक श्री रामलाल रौतेल
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अनुपपुर विधायक श्री रामलाल रौतेल ने आदिवासी जीवन एवं उनकी संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन मे साहित्यकारों की भूमिका की सराहना करते हुए कहा किसी भी क्षेत्र की कला एवं संस्कृति का विकास, प्रसार एवं उसे जीवंत रखने मे साहित्य की सदा ही विशेष भूमिका रही है। आज के समसामयिक युग मे जहां मानवीय मूल्यों का स्थान कहीं न कहीं आर्थिक मूल्यों ने लिया है वहाँ पर इस संस्कृति को बचा के रखने के लिए साहित्यिक समुदाय को आगे बढ़कर जिम्मेदारी लेनी होगी।
कहाँ है ईदगाह का हामीद जो बाजार मे संवेदनाए ढूंढ रहा था
कटक से आई हुई डॉ. कमलिनी पाणिगृही ने राष्ट्रीय शोध संगोस्ठी की विषयवस्तु के बारे मे चर्चा करते हुए कहा कि साहित्य ही समाज का दर्पण है। पहले इतने संसाधन नहीं थे फिर भी बाजारों मे स्थानीय मेलों मे सब कुछ मिलता था आज संसाधनो की कमी नही हैं, साधन, ई मार्केटिंग है पर फिर भी हमारी जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं, इसका कारण समाज कि विचारधारा मे बाजारवाद का घर कर जाना है, जिसमे आदमी कि सोच बिकती है मानसिकता बिकती है अब वो आपसी मेल, विचारो का आदान प्रदान और भाई चारा तो एक स्वप्न जैसा लगता है। आपने कहा अब वो ईदगाह का हामीद कहाँ जो बाजार मे संवेदनाए ढूंढ रहा था। इन्ही सब सामाजिक परिवर्तनों के कारणो का पता लगाने के लिए इस संगोष्ठी का आयोजन किया गया है।यह दो दिवसीय संगोष्ठी 10 एवं 11 मार्च को स्वसहायता भवन जैतहरी मे आयोजित की जा रही है, इस संगोष्ठी में देशभर के कई विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के आचार्य, अध्येता, शोधार्थी भाग ले रहे है, जिसमें डॉ. आर आर सिंह, डॉ. कमलिनी पाणीग्रही, कटक नवनीत पनारा, सुरेन्द्र नगर एम रामचन्द्रम हैदराबाद, डॉं. उर्मिला खरपूसे मंडला, डॉ. ममता उपाध्याय रीवा आदि अनेक विद्वान आए हुए हैं। |
Saturday, March 10, 2018
मानवीय सवेदनाओं को जीवित रखने मे साहित्य का विशेष स्थान - कमिश्नर श्री रजनीश श्रीवास्तव
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